मास्टर प्लान से बाहर 100 करोड़ की जमीन खरीदने वाले कई अफसर फंसेंगे

 


मास्टर प्लान से बाहर 100 करोड़ की जमीन खरीदने वाले कई अफसर फंसेंगे


ग्रेटर नोएडा। बसपा सुप्रीमो मायावती के गांव बादलपुर व सादोपुर में करीब 100 करोड़ रुपये की जमीन खरीदने में जल्द ही कई अफसर फंस सकते हैं। सीएजी ने मास्टर प्लान से बाहर इन दो गांवों की जमीन खरीदने पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा था कि किसके कहने पर मास्टर प्लान से बाहर होने के बावजूद इन दो गांवों की जमीन खरीदी गई।
इस पर प्राधिकरण ने जवाब दिया कि शासन के एक सचिव के कहने पर जमीन खरीदी गई। इस जवाब से असंतुष्ट सीएजी ने जमीन खरीदने के लिए बनी कमेटी में शामिल अधिकारियों के नाम सहित ब्योरा तैयार कर जवाब देने को कहा है। ऐसे में सीएजी की इस आपत्ति से कई अधिकारी फंस सकते हैं। जब भी किसी गांव की जमीन खरीदनी होती है तो उसके लिए कमेटी बनती है, जिसमें सीईओ व एसीईओ के अलावा प्रोजेक्ट, प्लानिंग, भूलेख समेत कई विभागों के अधिकारी सदस्य होते हैं। इनकी स्वीकृति के बाद जमीन खरीदी जाती है। सूत्र बताते हैं कि सीएजी अपनी फाइनल रिपोर्ट में इस गड़बड़ी का खुलासा कर सकती है। दरअसल, 2007 में बसपा सरकार बनने के बाद बादलपुर और सादोपुर में करीब 100 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई। उस समय ये दोनों ही गांव ग्रेटर नोएडा के मास्टर प्लान से बाहर थे। उस समय करीब 100 करोड़ रुपये में जमीन खरीदी गई थी। यह रकम किसानों को मुआवजे के तौर पर बांटी गई थी।
बादलपुर के जमीन अधिग्रहण पर भी चल रही जांच
सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट से इतर बादलपुर में जमीन अधिग्रहण की जांच पहले से ही चल रही है। योगी सरकार बनने के बाद बादलपुर के ग्रामीणों ने शिकायत की कि 2007-08 में बादलपुर व सादोपुर में मास्टर प्लान से बाहर जमीन खरीदी गई। प्राधिकरण ने अर्जेंसी क्लॉज लगाकर जमीन अधिगृहीत की। मुआवजा उठाने वालों में कई नेताओं व अधिकारियों के नाम सामने आए। इसी गांव में अधिगृहीत जमीन को आबादी की कुछ जमीन बताकर बैकलीज भी करा ली। साथ ही, प्राधिकरण की विकास परियोजनाओं में इस जमीन की जरूरत दिखाकर उसे एनएच-91 के पास बेहतर लोकेशन पर शिफ्ट करा लिया। प्रदेश सरकार ने इसकी जांच भी कराई, लेकिन कार्रवाई का इंतजार है।
जीडीपी की दर से रेट बढ़ाने पर भी आपत्ति
सीएजी ने ग्रेटर नोएडा में जमीन की दर देश की जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर को आधार बनाकर जमीन का रेट बढ़ाने पर भी आपत्ति जताई है। ऑडिट टीम ने पूछा है कि आखिर जमीन के मार्केट रेट को आधार बनाकर जमीन के रेट क्यों नहीं तय किए गए। जीडीपी को क्यों आधार बनाया गया। रेट कम होने की वजह से प्राधिकरण को काफी नुकसान हुआ है। बता दें कि पूर्व के वर्षों में जमीन का आवंटन रेट मार्केट का सर्वे कर तय करने के बजाय देश के जीडीपी को आधार मानकर तय किए गए हैं।